Nazar


पेहले जब हमारी "नजरे" मिलती थी,
तो हसी के फुलकारे उठाते थें,
अब तेरी "नजर" को याद करू
तो दिल मे 'खौफ' के बादल छा जाते हैं

ना तेरी "नजर" बदली,
ना मेरी "नजर" बदली,
शायद दोनो के नजरिये बदल गये;
नजर, नजर का खेल हैं सहाब
ना तेरा मुझसे कोई मेल था
ना मेरा तुझसे कोई मेल है.

ना तब तेरी नजर गलत थी,
ना मेरी नजाकियत कोई खेल
ना दोनो ने पेष किये हुअे कुछ नझराने.....
बस शायद दोनो के नजरिये ही कुछ और थे***
अब तो बस यही 'दुआ' है
जहा भी रहे बस...
दुनिया की "नजर" से बचा रहे

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