Prakriti ki prasannata


खुश है धरा
कि तू घर में है
खुश है धरा
कि तू बाहर नहीं
आज फ़िर सुबह हुई थी
पर सुबह रोज सी नहीं थी
धधकते अंगारों में भी
अलग सी नमी थी
वो अंगारा भी खुश था
कि तेरा वजूद न था
वो अंगारा भी खुश था
कि तू मौजूद न था
दिन चढ़ा सुहाना सा
सुहाना या गर्म पता न था
जो भी था प्रकृति का था
शुक्र है, तू अता न था
खुश है प्रकृति
तूने रौंदा नहीं आज
खुश है प्रकृति
मन कौंधा नहीं आज
सालों बाद आज पूरा दिन
दिन सा लगा मुझे
जैसे प्रकृति ने कानों में कहा
ऐसे ही रहने दो मुझे

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