Tu ZINDA hai Kahin


माना कि साथ नहि है हम,
पर मुकम्मल होता हूं तुझसे जहन मे।
तेरी तस्वीर नहि है मेरे पास,
हदय से श्रृंगारित कर तुझे निहारता हूँ।
जब कभी तेरी कमी खलती है,
रो लेता हूँ मुस्कुराहट के आङ में
तुझे याद करके ।

स्थिर जो हो जाता हूं मैं,
अपने वेग से धारा बना देती हो तुम।
जिंदगी के अँधेरी राह को ,
चांदनी से सजा देती हो तुम।
औरो के नजर में अकेला हूं,
मेरी नज़र से तो देखो,
हर रवा में तुम ही तुम हो ।

जो क्षितिज सा हमारा मेल है ,
वो कल्पना मेरा प्रेम है।
मैंने कभी तुम्हे देखा नहि,
पर चांद की चांदनी में,
तेरी छवि से महफूज हो जाता हूं ।

यूं तो कभी शब्द नही निकलते ,
पर जब तुम्हारी बात आती है ,
तो एक खुशनुमा कविता कह जाता हूं।।

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