Viraaniya


प्रथम अहसास «
सुनो....
याद है तुम्हे वो हमारी अलग सी मुलाकत
जो फिर कभी नही हुई ...

जब खाली हाथों संग आये थे हम सहमे हुए से
फिर मासूम मुस्कानों ने आसान बना दिया था तेरे प्रभावी शब्दों को और तेरी निश्छल आँखों ने सुलझा दिया था मेरी सारी उलझनो को ...हमारे बीच समझ का संवाद था।
तेरे लफ्ज इसलिए थे क्योंकि मैे चुप थी और मैे चुप थी क्योकि तेरे शब्दों की मीठास सीधे मेरे अन्तर्मन को छू रही थी ....

लेकिन मेै तो आज भी चुप हूं...
जब तूने बिना इकरार के इंकार कर दिया
जब मेरे जवाब पुन: सवाल बन गए
जब हमारे बीच एक अदृश्य सी दुरी आ गई
हमारी कहानी जब हमारे आदर्शो से टकरा गई ...

अब किससे मांगे गुलाबी पन्नो की किताब
किससे पूछे उन भीगते तकियो का हिसाब
तूने तो सुना दिया निर्णय दुरियो का
ज़िसको सून पाना भी मेरे लिए नामुमकिन सा था ...

तू उसका अंतिम संस्कार चाहता था
जो तूने कभी जीया ही नही
लेकिन मेरी तो रूह के अंश मे वो मौंजूद था
बेशक तूने राधा य़ा रूक्मनी का दर्जा ना दिया
लेकिन मीरा होना भी कहा छीन पाया मुझसे

तू उसे मार चुका था जो
मेरे हर दिन गिरते आसुओं मे हर समय ही पल रहा था ...
अब संशय यह कि इसका भविष्य क्या ?
तो वो निर्मम ह्रदय जो सौंपा था ना तूने कभी मुझको
महफुज रखुगी मै उसे समाज की
उन अनकही परम्परागत बातो सें।

वो ज़िसे तूने मार दिया था ,
वो मेरे भीतर ज़िन्दा था
और ताउम्र ज़िन्दा रहेगा...
अरे ये तो वह प्रथम अहसास है जो
मेरे पुर्णत: बूझने के बाद भी
सम्पूर्णता से सुलगता रहेगा .....

- स्वरचित
मल्लिका राजपुरोहित

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