Waqt ka aaina


कैसा दौर आया है जिंदगी का,
आदमी ही दुश्मन हो गया आदमी का,
राहते सुकुन था जब कदमों में उसके,
औरों के लिए दुआओं में न हाथ उठते थे उसके,
पैरो में पड़ी बेड़िया फिर भी धर्म का सहारा न लिया,
मंदिर मस्जिद बंद हुए मालिक ने भी मुह फेर लिया,
गुरूरे कामियाबी में कभी न इंसानियत देखी,
जिसके पीछे भागता रहा उसी कामयाबी ने है घेर लिया।
कैद और खौफ़ में जीते थे जानवर कैसे
न कभी इसकी परवाह की न कभी रहम किया,
कुदरत की लाठी कुछ ऐसी पड़ी,
मर्ज मिला है ऐसा जिसका न मरहम दिया,
इस सबक से सीखो तो गुलजार है जिंदगी,
वरना न कहना ऊपर वाले ने संभलने का मौका न दिया।

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