Waqt


सब्र कर ऐ मुसाफ़िर, ये वक़्त भी गुजर जाएगा।
बादलों में छुपा चांद, फिर अपनी रोशनी बिखेर जाएगा।
सब्र कर ऐ बंदे, ये वक़्त भी गुजर जाएगा।
रात तो आईं है यहां, पर सूर्य भी जरूर आएगा।
दिन में आया ये समा,देखते ही देखते ढल जाएगा।
सब्र कर ऐ बंदे, ये वक़्त भी गुजर जाएगा।
माना;माना अंधेरे में गहराई है,
तो कल उम्मीद का नया सवेरा भी आएगा।
मौत का यह खेल भी एक दिन,
खुद में सिमट कर रह जाएगा।
देखते ही देखते, हर वक़्त की तरह
ये वक़्त भी गुजर जाएगा।
सब्र कर ऐ बंदे, ये वक़्त भी गुजर जाएगा।
सब्र कर ऐ मुसाफ़िर, ये वक़्त भी गुजर जाएगा।

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