Wire of heart


मैं हूँ हक़दार ऐसी रातों का, हर वक़्त एक नई दुनियां में होता हूँ, तेरी मीठी यादों का तकिया लगा कर सोता हूँ..

शांत सरोवर से मन मैं, क्यूं हलचल हो जाती हैं,
सुखी पड़ी झिल में झिरमिर वर्षा हो जाती हैं,
ऐसी रिमझिम वर्षा से, हर वक़्त भीगा होता हूँ....

नही वक़्त कि कोई पाबंदी यहाँ,
दरवाजे पर लिपटी प्रेमलता यह कहती हैं
अपने प्रीतम की प्रतीक्षा में, प्रेममाला लिए रहती हैं,
ऐसे ख़्वाबों के मंजर में, मैं होता हूँ........

तेरे साये कि चादर, आज भी मेरे तन को ढकती हैं
तू ना सही फिर भी, तेरी मीठी यादों में वो शक्ति है,
वक़्त के हाथों में, मैं भी सिमटा होता हूँ......

भोर होती नही, नुर कि रोशनी भी तेरी आँखों
कि चमक लगती हैं,
ये अश्क नम आँखे बरसों तेरी प्रतीक्षा में जगती हैं ...
मैं भी क्या, वक़्त के पैर दबायें रोता हूँ

इस विचित्र कानन के आँगन में, मृगतृष्णी सोती हैं
पुलकित डाली के पल्लव पर, प्रेमपुष्प कि चोटी हैं
इस सुंदरता के मधुवन में, मैं भी मधुरस का लोटा हूँ.......

आदिल की थी, मोहब्बत हमने,
दिल मेरा भी तेरे आशुफ्ता हो जाता हैं,
आफ़ताब आगोश में, जैस तिमिर खो जाता हैं,

हर लहर उठे प्रेमसागर के तलछट से,
लहरो में लगाता गोता हूँ.........
मयंक मधुप गढ़े भ्रमरो को सुगन्ध दुर से आती हैं
पतझड़ के मौसम में हालात देनीय हो जाती हैं...
पतझड़ कि पगडंडी में भी, नंगे पैरो के, रास्ते में होता हूँ.......
सायंकाल कि वेला में प्रक्षेत्र मधुरम हो जाता हैं
भानु का अस्तांचल भी, उसकी याद दिलाता हैं
इन मधुर स्मृति के आलम से,
कहाँ विरक्त में होता हूँ..........

अब रोशनी चली गई हैं, काली रात भी डरी हुई,
मैं बेजान दीवार कि खूँटी रहा, तेरे योवन कि सांकर टँगी हुई.
प्रेमालाप के बन्धन से बँधा आईना में होता हूँ........

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem