तेरी बात


मैंने जब भी कुछ लिखने की शुरुआत की है
तब तब हर कविता में तेरी ही बात की है

मैंने लिखे हैं वह अधूरे वादे भी
जो कभी किए थे अपने आप से भी

मैंने लिखी है वह अनकही बातें
वो ना भुला पाने वाली मुलाकातें जो मैंने उन रातों में ख्वाबों में तुम्हारे साथ की हैं

हां मैंने तेरी परछाई तक को अपने साथ लिखा है
तेरी यादों में जो बीती हर उस रात को लिखा है

हां मैंने तुझे अपना मजहब, तुझे अपनी जात अपना ईमान लिखा है
मैंने मेरे एहसास का हर कलाम तेरा ही नाम लिखा है

मैंने तेरे हर अक्श को लफ्जों में उतारने की कोशिश की हैं

हां मैंने मेरी हर कविता में तुझे अपना बनाने की साजिश की है

मैंने जब भी कुछ लिखने की शुरुआत की है
तब तब हर कविता में तेरी ही बात की है

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